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जब गदा उठती है

Shreya Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब-जब धरती पर अधर्म काकाला साया छाता है,
        
                                                    
                            
जब निर्बल के आँसू पर
कोई अपना हक़ जताता है,
तब मौन नहीं रहता नभ भी,
तब काँप उठता है अन्याय-
क्योंकि पवनपुत्र की गदा में
बसती है धर्म की परछाईं।

वो गदा किसी क्रोध की
पहचान नहीं कहलाती,
वो तो सीमा पार करे जो,
उसे राह दिखाती।
जिस हाथ में आकर गदा
पर्वत-सी भारी होती है,
उस हाथ की भक्ति देखो-
फिर भी विनम्रता सारी होती है।

स्वर्ण-महल हों या रणभूमि,
गदा कभी मद नहीं करती,
सत्य के आगे झुकती है,
असत्य से समझौता नहीं करती।रावण का अभिमान मिटा,पर राम का नाम बचा,
हनुमत की उस गदा ने
धर्म का सम्मान बचा।

कभी ये गदा उठी तो
लंका का अहंकार हिला,
कभी इसी की छाया में
भक्तों को विश्वास मिला।
ये केवल लोहे की शक्ति नहीं,ये संकल्पों की धार है,
जहाँ खड़ा हो बजरंगी,
वहीं विजय का द्वार है।

हे गदाधारी महावीर!
एक वरदान हमें भी देना-
गदा जैसी दृढ़ता देना,
पर मन में अहंकार न देना।
अन्याय दिखे तो बोल सकें,
सत्य मिले तो डट जाएँ,
शक्ति मिले तो जग जीतें नहीं, किसी टूटे को थामने जाएँ।

तेरी गदा हमें ये सिखाए-
बल का अर्थ डराना नहीं,
शक्ति मिले तो कमजोरों को
और कमजोर बनाना नहीं।
जिसके हाथ में सामर्थ्य हो,
उसका पहला धर्म यही-
अन्याय के आगे झुकना नहीं,और निर्दोष पर उठना नहीं।

इसलिए तेरी गदा जब चमके,बस रण का शोर न हो-हर मन में सत्य जगाने वालाएक नया भोर हो।
जयकारों से अधिक पावन
तेरा ये संदेश रहे-
शक्ति उसी की सार्थक है,
जिसमें राम का वेश रहे।
एक दिन पहले
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