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शतरंज उसके साथ

shravan tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो चलती रही है चाल शतरंज का जिंदगी में
        
                                                    
                            
और मैं पांसे के खेल में जीवन हार गया
मैं उलझा रहा प्रेम के इन सिद्धांतों पर
खेल में दिल के वजीर को बड़ाया ही नहीं
अपने मोहरों को लगा दिया रानी की हिफाजत में
और वो बड़ी होशियारी से चल गई बाजी
मेरे ठीक सामने से फूलो की खुशबू की भांति
आकर काट दी सभी मेरे ख्वाबों के परिंदे
मैं कदर डूबा रहा खेल में की कब मेरे प्यादों से
मेरे ही मोहरों को काटकर उड़ा ले गई मेरी ही रानी और शतरंज का यह खेल भी

- अविस्मरणीय खेल
एक वर्ष पहले
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