वो चलती रही है चाल शतरंज का जिंदगी में
और मैं पांसे के खेल में जीवन हार गया
मैं उलझा रहा प्रेम के इन सिद्धांतों पर
खेल में दिल के वजीर को बड़ाया ही नहीं
अपने मोहरों को लगा दिया रानी की हिफाजत में
और वो बड़ी होशियारी से चल गई बाजी
मेरे ठीक सामने से फूलो की खुशबू की भांति
आकर काट दी सभी मेरे ख्वाबों के परिंदे
मैं कदर डूबा रहा खेल में की कब मेरे प्यादों से
मेरे ही मोहरों को काटकर उड़ा ले गई मेरी ही रानी और शतरंज का यह खेल भी
- अविस्मरणीय खेल
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