बेटी घर की शान है
मानवता की सुर तान है
बोझ नहीं सम्मान है
करता जो इनका अपमान है
दुष्टता की पहचान है
बेटी तो राष्ट्र का स्वाभिमान है
जीवन गंगा की गंगोत्री समान है
पंख मिले उन्मुक्त पंक्षी की उड़ान है
पर आज बेटी होती उदास है
खोती अपने मन की आश है
अरे शिक्षा की क्या बात है
यहाँ जन्म लेने में ही रार है
गाँव से लेकर शहरों तक
बस बेटी ही शर्मसार है
हम पे ये धिक्कार है
इंसानियत से टूटता हमारा करार है
जग जा रे इंसा ये लेखनी का वार है
धारा के विपरीत अब चलाना पतवार है
क्योंकी सुनहरा भविष्य दरिया के उस पार है.
-शोभित अवस्थी
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