उस हरियाली सर जमीं काली घटा की ओर ।
मैं तो चला गाँव की ओर ।।
जहँ तड़ाग संग उतुंग शिवालय ।
भोर अतिसुंदर लगे हिमालय ।।
कोयल जन मृदु भाष सी शोर ।
मैं तो चला गाँव की ओर ।।
तोयज़ की सुंदरता पानी अविरल की धारा ।
मन संग तन उठे खिल सांवल शाम हमारा ।।
जहँ विकरते विरंग - विरंग मोर ।।
मैं तो चला गांव की ओर ।।
जन जहँ मिले हहाक मिलान ।
संग विचार मिलन ।।
पूछत नैना हालचाल की ओर ।
मैं तो चला गांव की ओर ।।
युवा कवि एवं शायर
~ शिवसागर यादव 'आद्रवनी'
निवास स्थान~ धानी
जिला~ महराजगंज (उत्तरप्रदेश)
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।