मेरी माँ की साड़ी
मेरी माँ की साड़ी सिर्फ़ साड़ी नहीं,
मेरे बचपन की यादों का अनमोल ख़ज़ाना है।
बढ़ती उम्र के साथ मैं ख़ुद माँ बन गई,
फिर भी माँ की साड़ी से मेरा रिश्ता आज भी पुराना है।
ये वही यादें हैं,
जो मुझे बचपन की गलियों में ले जाती हैं,
और बेवजह ही मेरे होंठों पर
एक प्यारी-सी मुस्कान दे जाती हैं।
मेरी माँ की साड़ी की खुशबू
मुझे माँ के होने का एहसास कराती है।
वो दूर होकर भी
हर पल मेरे पास नज़र आती है।
हाँ, ये वही साड़ी है,
जिसे बचपन में पहनकर मैं खूब इतराती थी।
आईने में ख़ुद को देखकर
शरमा-शरमा कर मुस्कुराती थी।
"माँ, जब मैं बड़ी हो जाऊँगी,
क्या ये सारी साड़ियाँ मुझे दे दोगी?"
रोज़ यही पूछ-पूछकर
मैं माँ की जान खा जाती थी।
जब कभी डाँट पड़ती,
तो माँ की साड़ी के पीछे ही छिप जाती थी।
और अपने आँसू पोंछने के लिए
माँ का आँचल ही भिगो जाती थी।
हाँ, आज भी मेरा मन बच्चा है,
माँ की साड़ी का हर रंग सच्चा है।
आज भी माँ का आँचल
दिल को सबसे ज़्यादा भाता है,
उसकी गोदी में सिर रख दूँ,
तो हर दर्द कहीं खो जाता है।
मेरी माँ की साड़ी की हर बात निराली है।
मैंने जब-जब साड़ी पहनी है,
तब-तब उसी साड़ी ने
मेरे मन में ममता डाली है।
मेरी माँ की साड़ी सिर्फ़ एक परिधान नहीं,
वो मेरे बचपन की सबसे प्यारी कहानी है।
उसकी हर सिलवट में माँ का प्यार बसता है,
और वही मेरी ज़िंदगी की सबसे अनमोल निशानी है।