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ख्वाहिशों के परिंदे

Shashvat Rai

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इक उम्र की मशक्कत का सिला बस इतना सा मिलता है,
        
                                                    
                            
कि अपनी तनख्वाह से घर का दिया थोड़ी देर जलता है।

उड़ जाती है हवा बनकर वो पहली तारीख की शाम को ही,
और बाक़ी पूरा महीना सिर्फ एक खाली कमरा खलता है।
-शाश्वत
एक घंटा पहले
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