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ख्वाहिशों के परिंदे

                
                                                         
                            इक उम्र की मशक्कत का सिला बस इतना सा मिलता है,
                                                                 
                            
कि अपनी तनख्वाह से घर का दिया थोड़ी देर जलता है।

उड़ जाती है हवा बनकर वो पहली तारीख की शाम को ही,
और बाक़ी पूरा महीना सिर्फ एक खाली कमरा खलता है।
-शाश्वत
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43 मिनट पहले

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