सावन की बरसती बारिश से अब,
मन मेरा क्यों टूट गया है।
क्या ख़ता हुई मेरे यार, बता,
महबूब मेरा क्यों रूठ गया है।
भीगी-भीगी इन रातों में,
तेरी याद सताती है,
बिन तेरे ये चाँदनी भी,
मुझको तन्हा कर जाती है।
सावन की बरसती बारिश से अब,
मन मेरा क्यों टूट गया है।
क्या ख़ता हुई मेरे यार, बता,
महबूब मेरा क्यों रूठ गया है।
चाँद खड़ा है खिड़की पर ,
तारे भी कुछ कहते हैं,
तेरी यादों के साए में
संग संग मेरे वो भी रहते हैं।
भीगी पलकों पर इक चेहरा
हर रोज नज़र मुझे आता है,
बिन तेरे ये सावन भी अब,
दिल को बहुत रुलाता है।
किस बात की है ये ख़ामोशी,
क्यों दिल से दिल अब दूर हुआ है,
क्या ख़ता हुई मेरे यार, बता,
महबूब मेरा क्यों रूठ गया है।
तेरी ख़ामोशी चुभती है अब,
तेरी दूरी रुलाती है,
हवा चले तो तेरी खुशबू,
चुपके से छू जाती है।
एक बार लौट आ मेरे यारा,
दिल तेरा रास्ता देख रहा है,
सावन की बरसती बारिश से अब,
मन मेरा क्यों टूट गया है।
क्या ख़ता हुई मेरे यार, बता,
महबूब मेरा क्यों रूठ गया है।
याद करो प्रिय सावन की उस,
बारिश में हम तुम कैसे थे।
भीगी-भीगी उन राहों पर,
एक-दूजे के संग जैसे थे।
बूँदों की रिमझिम में छुपकर,
जब मुझको देखा करते थे,
मेरी पलकों पर ठहरी बूँदें,
अपने हाथों में लेते थे।
मैंने तो बस तुझको चाहा,
फिर क्यों मेरा कसूर हुआ है।
क्या ख़ता हुई मेरे यार, बता,
महबूब मेरा क्यों रूठ गया है।
वो छत, वो बादल, वो मौसम,
वो मीठी-मीठी बातें भी,
तुम पास रहे तो सावन था,
अब तो केवल बरसात रहीं।
जिस दिल में बस तू रहता था,
वो दिल आज क्यों टूट गया है,
क्या ख़ता हुई मेरे यार, बता,
महबूब मेरा क्यों रूठ गया है।
तेरे बिना ये मेरा जीवन,
जैसे खुद से ही रूठ गया है।
क्या ख़ता हुई मेरे यार, बता,
महबूब मेरा क्यों रूठ गया है।
सावन की बरसती बारिश से अब,
मन मेरा क्यों टूट गया है।
क्या ख़ता हुई मेरे यार, बता,
महबूब मेरा क्यों रूठ गया है।
~शशि भूषण