चैटिंग की इन भीनी रातों में,
जब साँसें पास बुलाती हैं,
ज्ञान व दर्शन की बातें भी,
रसिक रूप सजाती हैं!
तू प्रकृति-सी पावन कामिनी,
मैं व्याकुल एक तरंग प्रिये !
अंग-अंग से महके चंदन,
होंठों पर घुलता मकरंद प्रिये !
जब तेरी रेशमी जुल्फ़ों में,
मेरी उँगलियाँ खो जाएँ,
'मैं' और 'तुम' का भेद मिटे,
हम एक देह फिर हो जाएँ !
चुंबक सा एक खिंचाव यहाँ,
जो रोम-रोम सुलगाता है,
तेरी धड़कन की हर इक लय,
संगीत मुझे बनाता है !
न कोई दूरी, न कोई पर्दा,
बस अभेद का मधुर मिलन,
तेरी बाँहों में आकर फिर,
तृप्त हुआ मेरा जीवन !
-शशांक प्रिय मिश्र