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तृष्णा का विसर्जन : अन्योक्ति–दार्शनिक गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मरु-धरा पर मृग दौड़ता, मृगजल को सरिता माने,
        
                                                    
                            
दूर-दूर झिलमिल मरीचिका, अमृत-धारा-सी जाने।

रेत-कणों में नीर खोजता, प्यास स्वयं से छिपाता जाए,
स्वर्ण-मरीचिका के पीछे-पीछे, निज स्वरूप भुलाता जाए।

कभी कंचन-कानन लुभाए, कभी यश-शिखर मुस्काए,
मोह-मधु के मधुरिम प्याले, चेतन-दीप बुझाते जाएँ।

इच्छा-बेल लिपटती जाए, शाखा-शाखा प्राण सुखाए,
तृष्णा की ज्वाला ऐसी, पीकर भी फिर प्यास जगाए।

एक दिवस जब पथ थम गया, मृग का सारा भ्रम छूट गया,
बाहर जिसका मोल खोजता था, अंतस-स्रोत वह फूट गया।

मौन हुआ मन-मरुस्थल, अंतर-मेघ बरसने लगे,
सूखे घट के रिक्त कंठ में, अनहद-स्वर भरने लगे।

लोभ-लहर का तट गलने लगा, मोह-घट स्वयं दरकने लगा,
‘मैं’ की अंतिम गाँठ खुली तो, बूँद-सिंधु में ढलने लगा।

न पाने की कोई अभिलाषा, न खोने का भय शेष रहा,
तृष्णा निज मूल में विलीन हुई, अंतस में आकाश रहा।

बूँद मिली जब नील-सागर में, बूँद कहाँ फिर बूँद रही?
तृष्णा का जब हुआ विसर्जन, केवल चिति की ज्योति रही।
- सनातन मुकुंद
5 घंटे पहले
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