मरु-धरा पर मृग दौड़ता, मृगजल को सरिता माने,
दूर-दूर झिलमिल मरीचिका, अमृत-धारा-सी जाने।
रेत-कणों में नीर खोजता, प्यास स्वयं से छिपाता जाए,
स्वर्ण-मरीचिका के पीछे-पीछे, निज स्वरूप भुलाता जाए।
कभी कंचन-कानन लुभाए, कभी यश-शिखर मुस्काए,
मोह-मधु के मधुरिम प्याले, चेतन-दीप बुझाते जाएँ।
इच्छा-बेल लिपटती जाए, शाखा-शाखा प्राण सुखाए,
तृष्णा की ज्वाला ऐसी, पीकर भी फिर प्यास जगाए।
एक दिवस जब पथ थम गया, मृग का सारा भ्रम छूट गया,
बाहर जिसका मोल खोजता था, अंतस-स्रोत वह फूट गया।
मौन हुआ मन-मरुस्थल, अंतर-मेघ बरसने लगे,
सूखे घट के रिक्त कंठ में, अनहद-स्वर भरने लगे।
लोभ-लहर का तट गलने लगा, मोह-घट स्वयं दरकने लगा,
‘मैं’ की अंतिम गाँठ खुली तो, बूँद-सिंधु में ढलने लगा।
न पाने की कोई अभिलाषा, न खोने का भय शेष रहा,
तृष्णा निज मूल में विलीन हुई, अंतस में आकाश रहा।
बूँद मिली जब नील-सागर में, बूँद कहाँ फिर बूँद रही?
तृष्णा का जब हुआ विसर्जन, केवल चिति की ज्योति रही।
- सनातन मुकुंद
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