सूक्ष्म तंतुओं से तन बुना, मन माया में भरमाया है,
श्वास-करघे पर कर्म चले, जीवन-रंग चढ़ाया है।
मोह-मलिनता रंग चढ़ाए, चेतन-रूप छिपाया है,
अहं-गाँठ में बँधा हुआ मन, अपना सत्य भुलाया है।
लोभ-कतरनी धागा काटे, स्वप्न सभी बिखरते हैं,
क्रोध-अग्नि में रंग जलें तो, संस्कार सभी झरते हैं।
ममता-रेशम बाँध रहा जो, जीव उसी में खोता है,
मौन-करघे की धुन सुनकर, अंतर्मन कुछ रोता है।
विवेक-सलिल से धुलती चादर, निर्मल रूप निखरता है,
प्रेम-प्रभा के स्पर्श-मात्र से, अंतर-तम भी झरता है।
ताना टूटे, बाना छूटे, करघा मौन ठहरता है,
‘मैं’ का बुना हुआ आवरण, मिटते ही सत्य उभरता है।
निर्मल चादर लेकर जीव, मूल बुनकर को लौटाता है,
ताना-बाना मिटते ही जब, बुनकर ही शेष रह जाता है।
-सनातन मुकुंद