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श्राद्ध-पर्व : स्मृति से आत्मदीप तक

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पितृ-स्मृति के दीप जलें, अंतस उजियारा,
        
                                                    
                            
सूक्ष्म तंतु में कौन स्पंदे, नील सितारा।

तर्पण-बिंदु में झलके, युग-संचित अनुराग,
तिल-कण में जागे, जन्म-जन्म का राग।

कुश-दल पर ओस लिखे, मौन संदेश,
मंत्रातीत नाद में किसका सूक्ष्म प्रवेश।

मौन अर्घ्य में कौन मिले, चिर-प्रभात,
दीप-शिखा में कौन खिले, जीवन-संवाद।

रक्त-स्मृति में स्पंदित, पितृ-चेतना के तार,
श्वासों में अनहद जागे, सूक्ष्म झंकार।

वंश-वृक्ष की जड़ों में, काल-स्मृतियाँ सोतीं,
संस्कारों की मौन नदी, पीढ़ियाँ जोड़तीं।

मूलों से उठती रहती, अनदेखी पुकार,
अंतर में फिर जाग उठता, भूला हुआ संसार।

मृत्यु-पार भी शेष रहे, चिरंतन प्रकाश,
श्राद्ध-ज्योति में खुल जाए, आत्मा का आकाश।
- सनातन मुकुंद
3 घंटे पहले
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