अंतर में ध्रुव-दीप जले, तम कितना भी घना रहे,
सत्य-शिला पर चरण टिके, पथ कितना भी कठिन रहे।
आँधी आए, मेघ घिरे, संकल्प अडिग बना रहे,
मौन तपे अंतःकरण, सत्य भीतर जगा रहे।
स्वार्थ-धुंध के पार सदा, चेतन-दीप जला रहे,
अहं गलाकर समर्पण में, आत्मतत्त्व खिला रहे।
प्राणों में जब निष्ठा जगे, जीवन पथप्रदीप रहे,
स्वयं जले जो सत्य हेतु, जग में उसका दीप रहे।
- सनातन मुकुंद