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निष्ठावान : रहस्यवादी–दार्शनिक गीतिका

                
                                                         
                            अंतर में ध्रुव-दीप जले, तम कितना भी घना रहे,
                                                                 
                            
सत्य-शिला पर चरण टिके, पथ कितना भी कठिन रहे।

आँधी आए, मेघ घिरे, संकल्प अडिग बना रहे,
मौन तपे अंतःकरण, सत्य भीतर जगा रहे।

स्वार्थ-धुंध के पार सदा, चेतन-दीप जला रहे,
अहं गलाकर समर्पण में, आत्मतत्त्व खिला रहे।

प्राणों में जब निष्ठा जगे, जीवन पथप्रदीप रहे,
स्वयं जले जो सत्य हेतु, जग में उसका दीप रहे।
- सनातन मुकुंद
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2 घंटे पहले

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