नील नभांगन निःशब्द हुआ, नक्षत्र सुधा बरसाते हैं,
शांत सरोवर के उर पर, चंद्र-किरण झिलमिलाते हैं।
श्वास-सरोरुह धीरे खिलता, अंतर-गंध जगाता है,
बूँद-बूँद में सिंधु समाकर, भेद सभी मिट जाते हैं।
वन-वीणा के तार थमे तो, पर्ण स्वयं ध्यान लगाते हैं,
ओस-कणों में उषा उतरकर, स्वर्णिम मंत्र सुनाते हैं।
दिग्द्वारों पर धूप ठहरती, तम की तह सहलाती है,
अंतर-ज्योति दमककर, मन का तम हर जाती है।
सुख-सरिता, दुःख की धारा—दोनों शांत प्रवाह हुए,
मान-अपमान, लाभ-हानि, समता के अनुराग हुए।
राग-द्वेष के शुष्क पर्ण सब, चित्त-वृक्ष से झरते हैं,
शांत सुधाकर उगा हृदय में, मन के मेघ बिखरते हैं।
नाद विलीन हुआ जब भीतर, शून्य स्वयं स्वर बन बैठा,
शब्दातीत उस मौन-कुंज में, सत्य स्वयं मुखर हो बैठा।
‘मैं’ की अंतिम रेखा गलकर, ज्योति स्वयं में खो बैठी,
दर्पण टूटा—एक ही मुख था, भेद स्वयं ही सो बैठा।
न पथ शेष, न पथिक शेष है, न गंतव्य की कोई चाह,
न प्राप्ति का हर्ष शेष है, न अप्राप्ति की कोई आह।
अंतर-आकाश अखंड हुआ, दिशाएँ सो जाती हैं,
मौन-महेश्वर के चरणों में, लहरें तट हो जाती हैं।
अब न तृष्णा, न स्पंदन शेष, न आकांक्षा का भार रहा,
श्वास स्वयं जप बनकर ठहरी, हृदय स्वयं उद्गार रहा।
नयन मिटें तो विश्व समाया, नयन खुलें तो निर्विकार—
मौन हुआ तो चेतन जागा, ब्रह्म बना अंतर का गान।
- सनातन मुकुंद