अक्षर-अक्षर दीप जलाती, हिंदी मन का तम हरती है,
शब्द-शब्द सरिता-सी बहती, जीवन-प्यास सुधा भरती है।
माटी की सौंधी गंध समेटे, संस्कृति का स्वर बनती है,
भारत की अंतरतम वाणी, जन-मन में नित गूँजती है।
देवनागरी की रेखाओं में, युग-स्मृति नित मुस्काती है,
स्वर में वेदों की ध्वनि जागे, वाणी पावन हो जाती है।
माँ की लोरी, संत-वाणी, युग-युग राग सुनाती है,
हिंदी युग-युग की चेतन-धारा, सबको साथ बहाती है।
शब्द यहाँ केवल ध्वनि नहीं, जीवन-दर्शन बनते हैं,
अक्षर-अक्षर दीपक बनकर, अंतर के तम हरते हैं।
‘मैं’ से ‘हम’ की राह पकड़कर, मन के बंधन कटते हैं,
हिंदी मन के सूने आँगन, प्रेम-कुसुम से भरते हैं।
गंगा जैसी निर्मल धारा, सबको संग बहाती है,
भिन्न दिशाओं के स्वर लेकर, एक लय में गाती है।
उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम, एक भाव जगाती है,
भारत की बहुरंगी आत्मा, हिंदी में मुस्काती है।
तुलसी की करुणा इसमें, कबीर की हुंकार है,
मीरा का निर्मल अनुराग, सूर का मधुर प्यार है।
प्रसाद की गहन चेतना, पंत का मुक्त विस्तार है,
हिंदी अपने अक्षर-अक्षर में, युग का अमर संस्कार है।
जब शब्दों में सत्य जगे तो, वाणी साधना बनती है,
जब वाणी में प्रेम जगे तो, मानवता फिर खिलती है।
अक्षर जब अंतर को छू लें, मौन भी वाणी बनती है,
हिंदी तब केवल भाषा न रहकर, अंतर्ज्योति बनती है।
आओ, हिंदी के अक्षर को, जीवन में उतारें हम,
केवल बोलें ही क्यों हिंदी, आचरण में धारें हम।
एक दिवस का पर्व न हो, नित्य हृदय में धरें हम,
निज भाषा से निज संस्कृति का, गौरव सँवारें हम।
अक्षर से आरंभ हुई जो, आत्मस्वर तक आती है,
माटी से उठ मानव को वह, आत्मबोध तक लाती है।
भारत की अंतर्ध्वनि बन, चेतन-दीप जलाती है,
जिसमें जागे मानवता, वही हिंदी कहलाती है।
- सनातन मुकुंद