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बूँद-ब्रह्मरहस्योपनिषद् : अन्योक्ति–दार्शनिक गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नभ से उतरे तो सुधा बनकर, धरती का अभिषेक करे,
        
                                                    
                            
तपकर उठे तो वाष्प बने, नभ में फिर उड़ान भरे।

हिम बन जाए तो मौन तपे, श्वेत समाधि-सा ठहराए,
वज्र-कणों-सा टूट पड़े तो, कर्मों का फल समझाए।

फूल-पलकों पर ओस बने, कोमलता का गीत सुनाए,
पंखुरियों से गंध बनकर, अंतर-आकाश महकाए।

बूँद-बूँद जब एकत्रित हो, शांत सरोवर रूप धरे,
मर्यादा में जीवन बनकर, तृप्त धरा के प्राण भरे।

मर्यादा की सीमा लाँघे तो, प्रलय-प्रवाह उमड़ता है,
तटबंधों की नींव हिलाकर, जग का संतुलन टूटता है।

नयनों से निकले तो आँसू, अंतर की भाषा बन जाता,
देह-ताप से निकले स्वेद तो, कर्म-यज्ञ बनकर झर जाता।

हरि-चरणों से झरे तो, स्वयं चरणामृत कहलाए,
‘मैं’ का तट जब गल जाए, जीव ब्रह्म में लय पाए।

रूप बदलता जल कहता—रूप अनेक, पर तत्त्व एक,
बूँद-बूँद में ब्रह्म बहे, जागे निर्मल आत्मविवेक।

बूँद नहीं केवल जल-बिंदु—सागर का ही अंश है,
‘मैं’ का तट जब गल जाता है, तब ब्रह्म ही अवशेष है।
-सनातन मुकुंद
4 घंटे पहले
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