नभ से उतरे तो सुधा बनकर, धरती का अभिषेक करे,
तपकर उठे तो वाष्प बने, नभ में फिर उड़ान भरे।
हिम बन जाए तो मौन तपे, श्वेत समाधि-सा ठहराए,
वज्र-कणों-सा टूट पड़े तो, कर्मों का फल समझाए।
फूल-पलकों पर ओस बने, कोमलता का गीत सुनाए,
पंखुरियों से गंध बनकर, अंतर-आकाश महकाए।
बूँद-बूँद जब एकत्रित हो, शांत सरोवर रूप धरे,
मर्यादा में जीवन बनकर, तृप्त धरा के प्राण भरे।
मर्यादा की सीमा लाँघे तो, प्रलय-प्रवाह उमड़ता है,
तटबंधों की नींव हिलाकर, जग का संतुलन टूटता है।
नयनों से निकले तो आँसू, अंतर की भाषा बन जाता,
देह-ताप से निकले स्वेद तो, कर्म-यज्ञ बनकर झर जाता।
हरि-चरणों से झरे तो, स्वयं चरणामृत कहलाए,
‘मैं’ का तट जब गल जाए, जीव ब्रह्म में लय पाए।
रूप बदलता जल कहता—रूप अनेक, पर तत्त्व एक,
बूँद-बूँद में ब्रह्म बहे, जागे निर्मल आत्मविवेक।
बूँद नहीं केवल जल-बिंदु—सागर का ही अंश है,
‘मैं’ का तट जब गल जाता है, तब ब्रह्म ही अवशेष है।
-सनातन मुकुंद
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