आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बूँद-ब्रह्मरहस्योपनिषद् : अन्योक्ति–दार्शनिक गीतिका

                
                                                         
                            नभ से उतरे तो सुधा बनकर, धरती का अभिषेक करे,
                                                                 
                            
तपकर उठे तो वाष्प बने, नभ में फिर उड़ान भरे।

हिम बन जाए तो मौन तपे, श्वेत समाधि-सा ठहराए,
वज्र-कणों-सा टूट पड़े तो, कर्मों का फल समझाए।

फूल-पलकों पर ओस बने, कोमलता का गीत सुनाए,
पंखुरियों से गंध बनकर, अंतर-आकाश महकाए।

बूँद-बूँद जब एकत्रित हो, शांत सरोवर रूप धरे,
मर्यादा में जीवन बनकर, तृप्त धरा के प्राण भरे।

मर्यादा की सीमा लाँघे तो, प्रलय-प्रवाह उमड़ता है,
तटबंधों की नींव हिलाकर, जग का संतुलन टूटता है।

नयनों से निकले तो आँसू, अंतर की भाषा बन जाता,
देह-ताप से निकले स्वेद तो, कर्म-यज्ञ बनकर झर जाता।

हरि-चरणों से झरे तो, स्वयं चरणामृत कहलाए,
‘मैं’ का तट जब गल जाए, जीव ब्रह्म में लय पाए।

रूप बदलता जल कहता—रूप अनेक, पर तत्त्व एक,
बूँद-बूँद में ब्रह्म बहे, जागे निर्मल आत्मविवेक।

बूँद नहीं केवल जल-बिंदु—सागर का ही अंश है,
‘मैं’ का तट जब गल जाता है, तब ब्रह्म ही अवशेष है।
-सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर