विज्ञापन

आशीर्वाद : जो नियति को बदल दे

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मौन-अधरों का मंत्र बने, प्राणों में स्वर लहराए,
        
                                                    
                            
अदृश्य चेतन-ज्योति बने, तम में प्रभा बिखराए।

मातृ-अंचल की छाँह मिले, कंटक-पथ पर फूल खिले,
पितृ-कर का स्पर्श मिले, सुप्त साहस के पंख खुले।

गुरु-दृष्टि की दीप्ति पड़े, अंतस्तम का आवरण ढले,
सोया पुरुषार्थ जाग उठे, अग्निशिखा बन प्रखर जले।

संस्कारों की सूक्ष्म धारा, कर्मों का रूप सँवारे,
संकल्पों की जाग्रत ज्वाला, नियति के पथ निखारे।

आशीष नहीं केवल वचन, प्राणों में चेतन नाद जगाए,
शुष्क हृदय की वीणा पर, नवजीवन-राग सुनाए।

दुर्बल मन में बल भरकर, सोया साहस जगा दे,
भटकी चेतना के पथ पर, ध्रुव-दीप बन राह दिखा दे।

नियति कोई जड़ लेख नहीं, चेतन-कर्म से रूप ढले,
कृपा-बिंदु जब अंतस बरसे, शुष्क धरा पर फूल खिले।

सच्चा आशीष वही, जो ‘मैं’ का आवरण मिटाए,
सीमित तम के पार पहुँचकर, ‘हम’ का सूर्य जगाए।

तब जीवन का सत्य खिले—वर केवल वरदान नहीं,
आशीर्वाद जहाँ जागे भीतर, वहाँ नियति भी नियत नहीं।
- सनातन मुकुंद
4 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Pandey

461 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10767 कविताएं

View Profile

Mamta Tiwari

663 कविताएं

View Profile