आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आशीर्वाद : जो नियति को बदल दे

                
                                                         
                            मौन-अधरों का मंत्र बने, प्राणों में स्वर लहराए,
                                                                 
                            
अदृश्य चेतन-ज्योति बने, तम में प्रभा बिखराए।

मातृ-अंचल की छाँह मिले, कंटक-पथ पर फूल खिले,
पितृ-कर का स्पर्श मिले, सुप्त साहस के पंख खुले।

गुरु-दृष्टि की दीप्ति पड़े, अंतस्तम का आवरण ढले,
सोया पुरुषार्थ जाग उठे, अग्निशिखा बन प्रखर जले।

संस्कारों की सूक्ष्म धारा, कर्मों का रूप सँवारे,
संकल्पों की जाग्रत ज्वाला, नियति के पथ निखारे।

आशीष नहीं केवल वचन, प्राणों में चेतन नाद जगाए,
शुष्क हृदय की वीणा पर, नवजीवन-राग सुनाए।

दुर्बल मन में बल भरकर, सोया साहस जगा दे,
भटकी चेतना के पथ पर, ध्रुव-दीप बन राह दिखा दे।

नियति कोई जड़ लेख नहीं, चेतन-कर्म से रूप ढले,
कृपा-बिंदु जब अंतस बरसे, शुष्क धरा पर फूल खिले।

सच्चा आशीष वही, जो ‘मैं’ का आवरण मिटाए,
सीमित तम के पार पहुँचकर, ‘हम’ का सूर्य जगाए।

तब जीवन का सत्य खिले—वर केवल वरदान नहीं,
आशीर्वाद जहाँ जागे भीतर, वहाँ नियति भी नियत नहीं।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर