माटी-दीपक जलता-जलता, तम हरने का दान दे,
बुझती लौ के मौन अधर पर, अपना अमृत-गान दे।
बूँद बनी यह आत्म-ज्योति, सागर की पहचान दे,
सूने शंख बने इस मन को, अनहद का वरदान दे।
मृगतृष्णा के वन से निकाल, सत्य-सलिल की धार दे,
माया-पट के पार ले जाकर, आत्मतत्त्व का सार दे।
जग से कुछ भी माँगूँ न प्रभु, मेरा एक आग्रह मान ले,
मैं-भाव मिटे, तू ही तू हो, अपना मुझमें भान दे।
-सनातन मुकुंद