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आग्रह : आध्यात्मिक–दार्शनिक गीतिका

                
                                                         
                            माटी-दीपक जलता-जलता, तम हरने का दान दे,
                                                                 
                            
बुझती लौ के मौन अधर पर, अपना अमृत-गान दे।

बूँद बनी यह आत्म-ज्योति, सागर की पहचान दे,
सूने शंख बने इस मन को, अनहद का वरदान दे।

मृगतृष्णा के वन से निकाल, सत्य-सलिल की धार दे,
माया-पट के पार ले जाकर, आत्मतत्त्व का सार दे।

जग से कुछ भी माँगूँ न प्रभु, मेरा एक आग्रह मान ले,
मैं-भाव मिटे, तू ही तू हो, अपना मुझमें भान दे।
-सनातन मुकुंद
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2 घंटे पहले

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