माटी का तन लेकर आया, नाम मिला इंसान,
अंतस में जो झाँक न पाया, कैसे पाए मान?
दूसरे के आँसू में जब, अपना आँसू पाया,
करुणा के एक स्पर्श ने, पत्थर-मन पिघलाया।
सत्य-कंटकों पर चलकर भी, सत्य-व्रत निभाया,
मिथ्या-मोह के मृगजल ने, मन को नहीं भरमाया।
स्वार्थ-सीमा जब टूट गई, परहित हृदय में आया,
निष्काम सेवा के दीपक ने, जीवन-पथ चमकाया।
अहंकार की गाँठ खुली तो, ‘मैं’ का मोह मिटाया,
अंतर में छिपे सत्य ने तब, अपना बोध कराया।
बाहर जिसे खोजता फिरता, भीतर उसे ही पाया,
आत्मबोध की प्रभा ने अंतस का तम दूर भगाया।
देह से केवल आदमी है, कर्मों से पहचान,
करुणा, सत्य, परोपकार से, मिलता मानव-मान।
जन्म मिले तो आदमी है, आदमियत साधन है,
अपने भीतर मनुष्य बचा ले—यही जीवन-धन है।
-सनातन मुकुंद