आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आदमी और आदमियत : दार्शनिक–सामाजिक गीतिका

                
                                                         
                            माटी का तन लेकर आया, नाम मिला इंसान,
                                                                 
                            
अंतस में जो झाँक न पाया, कैसे पाए मान?

दूसरे के आँसू में जब, अपना आँसू पाया,
करुणा के एक स्पर्श ने, पत्थर-मन पिघलाया।

सत्य-कंटकों पर चलकर भी, सत्य-व्रत निभाया,
मिथ्या-मोह के मृगजल ने, मन को नहीं भरमाया।

स्वार्थ-सीमा जब टूट गई, परहित हृदय में आया,
निष्काम सेवा के दीपक ने, जीवन-पथ चमकाया।

अहंकार की गाँठ खुली तो, ‘मैं’ का मोह मिटाया,
अंतर में छिपे सत्य ने तब, अपना बोध कराया।

बाहर जिसे खोजता फिरता, भीतर उसे ही पाया,
आत्मबोध की प्रभा ने अंतस का तम दूर भगाया।

देह से केवल आदमी है, कर्मों से पहचान,
करुणा, सत्य, परोपकार से, मिलता मानव-मान।

जन्म मिले तो आदमी है, आदमियत साधन है,
अपने भीतर मनुष्य बचा ले—यही जीवन-धन है।
-सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर