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पहुंचा दिया है जिंदगी ने उस मक़ाम पे

Şhahnawaz Pahat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहुंचा दिया है जिंदगी ने उस मक़ाम पे
        
                                                    
                            
वहशत सी होती है चाहत के नाम से
गलियों से उनकी गुज़रते हैं तो मगरूर होते हैं
धोखा देकर नवाजते हैं जफ़ा के इल्ज़ाम से

मैं भटकता हूं उसके लिए दर बदर
वो सोते हैं घरों में आराम से
वो देखकर हमें फेर लेते हैं नज़रे
हालत है उनकी यही कल शाम से

दिल के ज़ख्म हैं कि भरते ही नहीं
ना महफ़िल में लगता दिल ना चैन जाम से
ना दिल ही रहा ना चाहतों की दुनिया
हुए हैं बर्बाद हम उनके इंतक़ाम से

हम हुए हैं रुस्वा ज़माने की नज़रों में
निकली जब कलम ए शमशीर नियाम से
मुहब्बत का ज़िक्र ना छेड़ शाहिद
हुए हैं वो सब क़िस्से तमाम से
-अश्क़ फतेहपुरी
एक घंटा पहले
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