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हर तरफ़ मिले मुझे धोखे इस संसार में

Şhahnawaz Pahat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर तरफ़ मिले मुझे धोखे इस संसार में
        
                                                    
                            
ज़िंदगानी दाँव पर लगा दी मैने प्यार में
ज़माने में मशहूर थी पाकीज़गी मुहब्बत की
तिजारत अब दिलों की होती है बाज़ार में

कल तलक तो सनम के जानू जेरे सर थे
अब पनाह भी नसीब नहीं दामने यार में
वो देखो लोग दौड़ रहे हैं रोजे महशर को
मैं अब तक बैठा हूं तेरे इंतजार में

ये बस्ती भी चहकती थी तेरे कहकहों से कभी
ये फिजाएं भी महकती थी कभी बहार में
राहों में हमारी जो बिछाते थे नजरें
हुए हैं रुस्वा आज उन्हीं के दरबार में

इंसाफ कुछ करना ए ज़माने वालों
हो गई गर ख़ता आलमे बेक़रार में
दिल अपना कुछ यूं सुलगता है शाहिद
जलते हैं ज़र्रे जैसे रोगज़ार में
-अश्क़ फतेहपुरी
 
एक घंटा पहले
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