हर तरफ़ मिले मुझे धोखे इस संसार में
ज़िंदगानी दाँव पर लगा दी मैने प्यार में
ज़माने में मशहूर थी पाकीज़गी मुहब्बत की
तिजारत अब दिलों की होती है बाज़ार में
कल तलक तो सनम के जानू जेरे सर थे
अब पनाह भी नसीब नहीं दामने यार में
वो देखो लोग दौड़ रहे हैं रोजे महशर को
मैं अब तक बैठा हूं तेरे इंतजार में
ये बस्ती भी चहकती थी तेरे कहकहों से कभी
ये फिजाएं भी महकती थी कभी बहार में
राहों में हमारी जो बिछाते थे नजरें
हुए हैं रुस्वा आज उन्हीं के दरबार में
इंसाफ कुछ करना ए ज़माने वालों
हो गई गर ख़ता आलमे बेक़रार में
दिल अपना कुछ यूं सुलगता है शाहिद
जलते हैं ज़र्रे जैसे रोगज़ार में
-अश्क़ फतेहपुरी
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