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छमक

Shahabuddin Shahabuddin

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लम्हा लम्हा सुबक रहा है अभी
        
                                                    
                            
कोई शायद सिसक रहा है अभी

गुल थे मुरझा गये हैं कमसिन वो
नाम मेरा चमक रहा है अभी

शर्म की ओस में वो भीगा है
हुस्न उसका दमक रहा है अभी

फूल सी सुर्ख हसरतों के लिये
गालियों सा लचक रहा है अभी

लाख पर्दों में रहके पायल सा
कोई दिल में छमक रहा है अभी

शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी

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