लम्हा लम्हा सुबक रहा है अभी
कोई शायद सिसक रहा है अभी
गुल थे मुरझा गये हैं कमसिन वो
नाम मेरा चमक रहा है अभी
शर्म की ओस में वो भीगा है
हुस्न उसका दमक रहा है अभी
फूल सी सुर्ख हसरतों के लिये
गालियों सा लचक रहा है अभी
लाख पर्दों में रहके पायल सा
कोई दिल में छमक रहा है अभी
शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी
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