नन्हे नन्हे बोलों से जो मां को सदा लुभाती थी
मां गुस्सा हो जाये तो फिर सीने से लग जाती थी
नन्हें नन्हें हाथों से वो मां का हाथ बंटाती थी
मां थपकी दे देकर अक्सर लोरी उसे सुनाती थी
छीन ले गये वहशी उसको कुछ तो तुम अफ़सोस करो
गुड़ियों को महफ़ूज़ करो गुड़ियों को महफ़ूज़ करो
कुछ बन जाये पढ़ लिख कर वो अरमान यही था बाबा का
कमज़ोर न रह जाये बेटी भी सपना था ये पापा का
रश्क था अपनी बेटी पर मां को और मान थी नानी नाना का
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ फरमान था आली जाना का
क़ानून बनाकर फांसी का बेटी को मज़बूत करो
गुड़ियों को महफ़ूज़ करो गुड़ियों को महफ़ूज़ करो
किन वहशी आंखो से देखा शैत्वान के पैरोकारों ने
झुलस गया मां का कोमल मन सोच के उन चित्तकारों को
साया बनकर पाला जिसको ममता से दुलाराया था
उसी देह को उसी स्नेह के शव को हाथ लगाया था
उस मां की विपदा का देखो दर्द ज़रा महसूस करो
गुड़ियों को महफ़ूज़ करो गुड़ियों को महफ़ूज़ करो
शहाबुद्दीन उद्दीन कन्नौजी
हाजी गंज,कन्नौजी(यू़०पी०)
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