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बेटी

Shahabuddin Shahabuddin

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नन्हे नन्हे बोलों से जो मां को सदा लुभाती थी
        
                                                    
                            
मां गुस्सा हो जाये तो फिर सीने से लग जाती थी
नन्हें नन्हें हाथों से वो मां का हाथ बंटाती थी
मां थपकी दे देकर अक्सर लोरी उसे सुनाती थी
छीन ले गये वहशी उसको कुछ तो तुम अफ़सोस करो
गुड़ियों को महफ़ूज़ करो गुड़ियों को महफ़ूज़ करो

कुछ बन जाये पढ़ लिख कर वो अरमान यही था बाबा का
कमज़ोर न रह जाये बेटी भी सपना था ये पापा का
रश्क था अपनी बेटी पर मां को और मान थी नानी नाना का
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ फरमान था आली जाना का
क़ानून बनाकर फांसी का बेटी को मज़बूत करो
गुड़ियों को महफ़ूज़ करो गुड़ियों को महफ़ूज़ करो

किन वहशी आंखो से देखा शैत्वान के पैरोकारों ने
झुलस गया मां का कोमल मन सोच के उन चित्तकारों को
साया बनकर पाला जिसको ममता से दुलाराया था
उसी देह को उसी स्नेह के शव को हाथ लगाया था
उस मां की विपदा का देखो दर्द ज़रा महसूस करो
गुड़ियों को महफ़ूज़ करो गुड़ियों को महफ़ूज़ करो


शहाबुद्दीन उद्दीन कन्नौजी
हाजी गंज,कन्नौजी(यू़०पी०)

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