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अजनबी

Shahabuddin Shahabuddin

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ना सलाम का तू जवाब दे
        
                                                    
                            
ना ही मुझ से तू कलाम कर
ना नज़र को फेर ना झुका नज़र
किसी अजनबी सा क़याम कर

न ठिठक के चल न झिझक ज़रा
न तड़प दिखा ना हो बेकरार
ना लबों को खोल न सुलग दिखा
न ही ज़िन्दगी मेरे नाम कर
किसी अजनबी सा,

ना ही लट से खेल न लचक ज़रा
ना दबा के छोर है दुपट्टा तेरा
न ही होश में तू दिखा मदहोश
न सुपुर्द लब को ये जाम कर
किसी अजनबी,

तेरी ग़फलतें जो ये हिक़मतें
हैं अलामतें के तुझे प्यार है
ये सदाक़तें हैं बता रहीं
इन्हीं हसरतों का क़याम कर
किसी अजनबी,

ये धुली धुली सी जो आंख है
ये भटक रहा जो मिज़ाज है
ये लरज़ता सा जो भी ख़्वाब हैं
मेरे साथ आ मेरे नाम कर
किसी अजनबी,

मुझे आस है के मेहर तेरी
हैं मेरे लिये है मेरे लिये
तेरी चाहतों का गुलाब सुर्ख
मुझे सौंप दे मुझे थाम कर
किसी अजनबी...

कभी मुन्तजिर रही राह पर
तेरी मन्ज़िलों से वो दूर थी
चली आ के अभी जा ऐ सनम
मेरी क़ाविशों को मक़ाम कर
किसी अजनबी सा मक़ाम कर

- शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले
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