विज्ञापन

च से 'चिड़िया'

saurabh yadav

Mere Alfaz
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            अकसर आंगन में दिख जाती थी गौरेया
        
                                                    
                            
बच्चे उड़ा कर हो जाते थे खुश
जब नहीं दिखती थी तब आटे की
लोई सेबना कर दी जाती थी 'चींचीं'

और बच्चे फिर हो जाते थे खुश
वक़्त की मार और बदलाव की बयार ने
दोनों को उड़ा दिया
बच्चे अब नहीं होते खुश

देखते हैं बस तस्वीरों में फोन की स्क्रीन पर
अब बस याद कर लेते हैं.. च से 'चिड़िया'

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all