बोली पर विश्वास का, रहा नहीं अब दौर
दिल की भाषा और है, संवादों की भाषा और।
धन-वैभव होते हुए, फिर क्यूँ है हाहाकार
करो विचार इस बात पर, मैं भी करूँ थोड़ा संचार।
सबका हितैषी तो वही, जो सबका साथ बंटाय
वेदना सबकी वो सुने, अपनी किसको सुनाय।
नित अनुदिन जन्म कुंडली, देखे और दिखाय
अपना जीवन शुभ घड़ी, ढूँढ़े पर ढ़ूँढ़ न पाय।
दान-धरम कर लाज बचा, होना मत बदनाम
जो रक्खा गाड़ के, वही आयेगा काम।
षड्यंत्र ने युक्ति से, बिखरा दिये हैं काँच
इन पर तू नटराज, नाच सके तो नाच।
- सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”