विज्ञापन

ये रास्ते,कितनी तरफ खुलते हैं...

Saroj Yadav

Mere Alfaz
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            कभी दिल में ही रह जाए कभी दुनिया से मिलते हैं
        
                                                    
                            
कभी चल कर भी भरमाये मुझे कोई तो समझाए
ये रास्ते,कितनी तरफ खुलते हैं
कभी चाहत पुकारे है कभी आवाज फर्जों की
मैं ढोये जा रहा हूँ बोझ कितने सारे कर्जों की
कोई दिल से ,कोई आकर बड़ी मतलब से मिलते हैं
ये रास्ते, कितनी तरफ खुलते हैं
बड़ी बेचैनी है मुझको जरा सा खुल के जीने की
अभी जिंदा हूँ मैं शायद ये धड़कन कहती सीने की
फुरसत जो मिले सबसे तो धड़कन से भी मिलते हैं
मगर,ये रास्ते, कितनी तरफ खुलते हैं
हमेशा कितने समझौते हमेशा झुकते रहते हैं
मगर कितनी शिकायत तब भी हमसे करते रहते हैं
किसी दिन हार कर मुमकिन कहीं पर हम भी खो जाए
मगर कोई ये तो समझाए
ये रास्ते,कितनी तरफ खुलते हैं कितनी तरफ खुलते हैं
"सरु"

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Sanjay Nirala

42 कविताएं

View Profile

Nema Ram

141 कविताएं

View Profile