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ये रास्ते,कितनी तरफ खुलते हैं...

Ye Raste, Kitani Taraf Khulte Hain
                
                                                         
                            कभी दिल में ही रह जाए कभी दुनिया से मिलते हैं
                                                                 
                            
कभी चल कर भी भरमाये मुझे कोई तो समझाए
ये रास्ते,कितनी तरफ खुलते हैं
कभी चाहत पुकारे है कभी आवाज फर्जों की
मैं ढोये जा रहा हूँ बोझ कितने सारे कर्जों की
कोई दिल से ,कोई आकर बड़ी मतलब से मिलते हैं
ये रास्ते, कितनी तरफ खुलते हैं
बड़ी बेचैनी है मुझको जरा सा खुल के जीने की
अभी जिंदा हूँ मैं शायद ये धड़कन कहती सीने की
फुरसत जो मिले सबसे तो धड़कन से भी मिलते हैं
मगर,ये रास्ते, कितनी तरफ खुलते हैं
हमेशा कितने समझौते हमेशा झुकते रहते हैं
मगर कितनी शिकायत तब भी हमसे करते रहते हैं
किसी दिन हार कर मुमकिन कहीं पर हम भी खो जाए
मगर कोई ये तो समझाए
ये रास्ते,कितनी तरफ खुलते हैं कितनी तरफ खुलते हैं
"सरु"

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8 वर्ष पहले

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