वो इतनी दूर तक क्या साथ मेरा दे पाता,
उसे भी क्या किसी मंजिल की चाह ना होती
जरूर वक्त ने उसको भी कुछ सताया है
नहीं जबान ने नजरों ने कुछ बताया है
वो इतनी दूर क्यों इस तरह देखता रहता
पसंद उसको भी आये वो राह ना होती
उसे भी क्या किसी मंजिल की चाह ना होती
तमाम दुनिया की खुशियों में डूब जाता वो
लोग हंसते हैं तो कभी खुद भी मुस्कराता वो
नमी आंखों में भला कौन चाहता होगा
आंख हंस लेती यूँ होठों पे आह ना होती
उसे भी क्या किसी मंजिल की चाह ना होती
मैं चाहती हूँ कोई वजह जो मिलती खुशियों की
किसी तरह से बदलती जो राह शूलों की
उदास चेहरे में खुशियों की लकीरें सजती
खुशियां मिल जाती तो गम की ये बात ना होती
उसे भी क्या किसी मंजिल की चाह ना होती
वो इतनी दूर तक क्या साथ मेरा दे पाता,
उसे भी क्या किसी मंजिल की चाह ना होती
सरोज यादव सरु
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