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तरसा वो एक निगाह को दुनिया की उम्र भर...

Saroj Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तरसा वो एक निगाह को दुनिया की उम्र भर
        
                                                    
                            
जाने के बाद जो हंसी तस्वीर बन गया

खाने को भी तरस गया जो दो तीन निवाले
जाकर के मन्नतों का वो फ़क़ीर बन गया

कैसी है इस जहाँ की निगाहें मेरे खुदा
जिंदा था कुछ नही था अब वो पीर बन गया

दुनिया भी अपने दर्द में डूबी कराहती
देखे है उस तरफ के जो नजीर बन गया

दो दिन की फ़क़त जिंदगी मिली मेरे खुदा
दो दिन की जिंदगी भी गम का तीर बन गया

जी लेंगे हम उसी तरह कि जैसी तेरी मरजी
हालात न बदले मैं थक के चूर हो गया

जीते हैं किस तरह सभी अपनो को भूल कर
मैं याद करूँ यह भी एक कुसूर बन गया

सरोज यादव सरु

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