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तरसा वो एक निगाह को दुनिया की उम्र भर...

                
                                                         
                            तरसा वो एक निगाह को दुनिया की उम्र भर
                                                                 
                            
जाने के बाद जो हंसी तस्वीर बन गया

खाने को भी तरस गया जो दो तीन निवाले
जाकर के मन्नतों का वो फ़क़ीर बन गया

कैसी है इस जहाँ की निगाहें मेरे खुदा
जिंदा था कुछ नही था अब वो पीर बन गया

दुनिया भी अपने दर्द में डूबी कराहती
देखे है उस तरफ के जो नजीर बन गया

दो दिन की फ़क़त जिंदगी मिली मेरे खुदा
दो दिन की जिंदगी भी गम का तीर बन गया

जी लेंगे हम उसी तरह कि जैसी तेरी मरजी
हालात न बदले मैं थक के चूर हो गया

जीते हैं किस तरह सभी अपनो को भूल कर
मैं याद करूँ यह भी एक कुसूर बन गया

सरोज यादव सरु

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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