विज्ञापन

एक दिन की वतनपरस्ती कोई त्योहार नही होता...

Saroj Yadav

Mere Alfaz
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            एक दिन की वतनपरस्ती कोई त्योहार नही होता
        
                                                    
                            
एक दिन झंडा उठाकर कोई सरदार नही होता
लहू बनकर ही बहता है देश पर मिटने का जज्बा
जीने के मोह के साथ ही जो उठ जाए, आजादी का इतना भी कम भार नही होता
क्या जज्बा था उन लोगों का हंसकर के जान लुटा बैठे
अब सारी ताकत बातों में अपना बलिदान नही होता
एक दिन वतनपरस्ती कोई त्योहार नही होता
एक दिन झंडा उठाकर कोई सरदार नही होता

""शहीद दिवस"" याद भारत माँ के वीर सपूतों की""

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Sanjay Nirala

42 कविताएं

View Profile

Nema Ram

141 कविताएं

View Profile