एक दिन की वतनपरस्ती कोई त्योहार नही होता
एक दिन झंडा उठाकर कोई सरदार नही होता
लहू बनकर ही बहता है देश पर मिटने का जज्बा
जीने के मोह के साथ ही जो उठ जाए, आजादी का इतना भी कम भार नही होता
क्या जज्बा था उन लोगों का हंसकर के जान लुटा बैठे
अब सारी ताकत बातों में अपना बलिदान नही होता
एक दिन वतनपरस्ती कोई त्योहार नही होता
एक दिन झंडा उठाकर कोई सरदार नही होता
""शहीद दिवस"" याद भारत माँ के वीर सपूतों की""
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