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आखिर बादल घर आया

Saroj Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जमीं को देखा है मैंने गम से घिरी विरहन के मानिंद
        
                                                    
                            
उड़े हुए रंग और बिखरे बिगड़े से लिबास में
जैसे जिये जा रही हो वो बड़ी मेहनत से बची हुई सांसों को खींचते हुए
जैसे आखिरी उम्मीद लगाए बैठी हो अपने स्नेहिल बादल की
जैसे घुट के भी जीना चाह रही हो प्रियतम की प्रतीक्षा में
और आश्चर्य आज क्षण भर में बदल गयी काया
बारिस होते ही ये कैसी हो गयी माया
सोंधी इत्र में नहाई सी निखर गयी
मुस्कान इसके अधरों पर बिखर गई
बड़े जतन से बांध रखी है अपनी धानी चुनर
अब जाके दिखा इसके सजने संवरने का हुनर
संतोष हुआ मुझे भी इसके खिले हुए रूप पर
अब क्रोध भी नही रहा बेरहम धूप पर
इस धूप ने ही तो धरती को दुख से झुलसाया
द्रवित होकर ही तो आख़िर अब बादल घर आया।

सरोज यादव सरु

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