जमीं को देखा है मैंने गम से घिरी विरहन के मानिंद
उड़े हुए रंग और बिखरे बिगड़े से लिबास में
जैसे जिये जा रही हो वो बड़ी मेहनत से बची हुई सांसों को खींचते हुए
जैसे आखिरी उम्मीद लगाए बैठी हो अपने स्नेहिल बादल की
जैसे घुट के भी जीना चाह रही हो प्रियतम की प्रतीक्षा में
और आश्चर्य आज क्षण भर में बदल गयी काया
बारिस होते ही ये कैसी हो गयी माया
सोंधी इत्र में नहाई सी निखर गयी
मुस्कान इसके अधरों पर बिखर गई
बड़े जतन से बांध रखी है अपनी धानी चुनर
अब जाके दिखा इसके सजने संवरने का हुनर
संतोष हुआ मुझे भी इसके खिले हुए रूप पर
अब क्रोध भी नही रहा बेरहम धूप पर
इस धूप ने ही तो धरती को दुख से झुलसाया
द्रवित होकर ही तो आख़िर अब बादल घर आया।
सरोज यादव सरु
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