विज्ञापन

अध्यापक की नजर से

Saroj Yadav

Mere Alfaz
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            होता आ रहा क्रम से प्रतिवर्ष
        
                                                    
                            
कुछ नए चेहरों का आना
कुछ का जाने पहचाने बन के जाना
देखती हूँ चमकती उनकी आंखों में
कल के लिए सजते सुनहरे सपने
सुनती हूँ तसल्ली से उनकी योजनाएं
खुद भी शामिल होती हूँ आदतन
उनके चित्रों में रंग भरने के लिए
जाने कब गिनती के दिन बीत जाते है
नए से पहचान होने लगती है
पहचान लिए गए विदा लेते हैं
नम आंखों से
सचमुच एक अध्यापक
मां बाप से अधिक विछोह सहन करता है
मगर खुश रहता है क्योंकि
यह वो है जो राष्ट्र निर्माण की
कठिन जिम्मेदारी वहन करता है

सरोज यादव सरु

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Sanjay Nirala

42 कविताएं

View Profile

Nema Ram

141 कविताएं

View Profile