होता आ रहा क्रम से प्रतिवर्ष
कुछ नए चेहरों का आना
कुछ का जाने पहचाने बन के जाना
देखती हूँ चमकती उनकी आंखों में
कल के लिए सजते सुनहरे सपने
सुनती हूँ तसल्ली से उनकी योजनाएं
खुद भी शामिल होती हूँ आदतन
उनके चित्रों में रंग भरने के लिए
जाने कब गिनती के दिन बीत जाते है
नए से पहचान होने लगती है
पहचान लिए गए विदा लेते हैं
नम आंखों से
सचमुच एक अध्यापक
मां बाप से अधिक विछोह सहन करता है
मगर खुश रहता है क्योंकि
यह वो है जो राष्ट्र निर्माण की
कठिन जिम्मेदारी वहन करता है
सरोज यादव सरु
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