उनसे कैसे गिला करूं
अपनी बनने वाली थीं
रौब जमाती थीं ऐसे
जैसे कि घरवाली थीं।
चंद दिनों के लिए थी आईं
दूर की लगती साली थीं
लिपटी रहती थीं दिन भर
करती मेरी रखवाली थीं।
बरसों बाद जब मिलीं आज
तो लगातीं ' देवी काली’ थीं।।
– संजय कुमार गुप्त 'अबोध’