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उनसे कैसे गिला करूं

Sanjai kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उनसे कैसे गिला करूं
        
                                                    
                            
अपनी बनने वाली थीं
रौब जमाती थीं ऐसे
जैसे कि घरवाली थीं।

चंद दिनों के लिए थी आईं
दूर की लगती साली थीं
लिपटी रहती थीं दिन भर
करती मेरी रखवाली थीं।

बरसों बाद जब मिलीं आज
तो लगातीं ' देवी काली’ थीं।।
– संजय कुमार गुप्त 'अबोध’
4 घंटे पहले
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