आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

उनसे कैसे गिला करूं

                
                                                         
                            उनसे कैसे गिला करूं
                                                                 
                            
अपनी बनने वाली थीं
रौब जमाती थीं ऐसे
जैसे कि घरवाली थीं।

चंद दिनों के लिए थी आईं
दूर की लगती साली थीं
लिपटी रहती थीं दिन भर
करती मेरी रखवाली थीं।

बरसों बाद जब मिलीं आज
तो लगातीं ' देवी काली’ थीं।।
– संजय कुमार गुप्त 'अबोध’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर