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तूं सूरज, मैं चंदा हूँ।

Sanjai kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उसने यूँ मुँह घुमा लिया
        
                                                    
                            
जैसे नाली का गंदा हूँ
वर्षों पहले कहा था उसने
तूं सूरज, मैं चंदा हूँ ।

पलटा समय, वे हुए सम्पन्न
मैं वही पुराना बंदा हूँ
पूछा कारण तो घूरे ऐसे
ज्यों विंध्याचल का पण्डा हूँ।

वह किशमिश से बने अंगूर
मैं आज भी वही सरकंडा हूँ।।
– संजय कुमार गुप्त 'अबोध’
4 घंटे पहले
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