आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तूं सूरज, मैं चंदा हूँ।

                
                                                         
                            उसने यूँ मुँह घुमा लिया
                                                                 
                            
जैसे नाली का गंदा हूँ
वर्षों पहले कहा था उसने
तूं सूरज, मैं चंदा हूँ ।

पलटा समय, वे हुए सम्पन्न
मैं वही पुराना बंदा हूँ
पूछा कारण तो घूरे ऐसे
ज्यों विंध्याचल का पण्डा हूँ।

वह किशमिश से बने अंगूर
मैं आज भी वही सरकंडा हूँ।।
– संजय कुमार गुप्त 'अबोध’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर